दोस्त
(5 years back)
गर फिरदौस के दिन लौट कर आते नहीं,
वोह दिन हमसे भुलाए जाते नहीं!
अपनों का दामन यूँ चूता की अब हम खुद को संभाल पाते नहीं
जो बचपन से अपना था , जहा बना
जिसके साथ जुदा हमारा हर सपना था
वोह साथी ही हमसे छूट गए
हम तोह एक पल में टूट गए
जब भी कोई ख़ुशी मानते हैं,
उन साथियों को याद फरमाते हैं
जिनके साथ की थी शैतानियाँ, लड़ते थे जिन से !
गूंजती थी जिनके साथ किलकारियां
उन्ही की याद में मोटू की लड़ , आँखों को नम्म कर जाती है
पर एक प्यारी से दोस्त के वादे पर ,
आँहों में सिमट जाती है, पलकें झुक जाती हैं
साथी यहाँ भी हैं, पर उन सा कहाँ
दोस्त यहाँ भी है, पर नवाबीपन जादा
बचपन जहां बीता उसके झारूखे को तरस जाते हैं
पुराने दूर हो गए, बेगाने हो गए
लगता है, कुछ अपने भी अनजाने हो गए!
अब जीवन नए के साथ काटना है,
समय की गति को स्वीकारना है!
पर तुम सब मुझे न भूलना - क्यूंकि
मुझे नहीं है सबको भुलाना
कभी मुझे भी याद फरमाना !
यादों की ओढ़ में लेखनी चुप गयी!
आँखें नम्म होकर फिर झुक गयी!
फिर झुक गयी!
Friday, March 5, 2010
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