श्यामल चादर , और उसपे ये चांदनी की नक्काशी .
मद्धम सी हवा , बावरा भवरा .
इतराता बादल चाँद को ओड़नी उढाता हुआ.
ऐसा समा देख किसे ना इश्क हो जाएगा .
व्याकुल मन और गंगा का तट ,
मद्धम स्वर , दूर पायल की छन छन.
कौन तेरा कान्हा न बनना चाहेगा.
पर इस सन्नाटे को चीरता , एक बावाली का विलाप.
तन धूमिल और मनन विचलित,
उसपर श्यामल चादर के केवल ढाक.
कौन सा कान्हा अब इस को अपनाएगा.
फिर सुनता हूँ मैं एक घनघोर नाद.
गंगा में तरंगें उठती हुई,पल भर में फिर था
गंगा का मद्धम स्वर हवा में व्याप्त
और सुबह की पहली किरण पड़ते ही मैंने देखा
संतुष्ट चील का झुण्ड गंगा तट पर कर रहा था वाद विवाद!